बालाघाट। आदिवासी क्षेत्रों में सरकार विकास के तमाम दावे तो करती हैं लेकिन हकीकत इससे कोसो दूर नजर आ रही है। पानी की दरकार में आदिवासी की जिंदगी काफी निराशा जनक हो गयी है, जिले के बिरसा, लांजी ,बैहर ,परसवाड़ा के दर्जनों गांवों में आज भी हालात बदतर हैं जो दूषित पानी पी कर काट रहें है आदिवासी अपनी जिंदगी।
पिछले दिनों आदिवासी बाहुल्य गांव की पड़ताल की गयी. दरअसल, वर्ष के हर मौसम में इन गांवों में पानी के लिए मारामारी होती रहती है। जंगली और पहाड़ी क्षेत्र होने की वजह से यहां पानी बहुत ही मुश्किल से मिलता है। इन क्षेत्रों के गांवों में हेडपंप नहीं है कुछ जगह है तो सालों से बंद पड़े हैं जिस कारण से लोग तालाब, नदी या कच्चे कुएं का पानी-पीने को मजबूर हैं। इसी वजह से कई जगह दूषित पानी पीया जा रहा है यानि प्यास बुझाने के लिए जिस पानी का उपयोग हो रहा है वह प्रदूषित है।
जिसमें देखा गया कि सौधाईडोगरी,चौरिया सहित अन्य गांव मे मुआयना के दौरान इन गांव में सड़क, बिजली से कहीं ज्यादा पानी की ही चिंता देखी गयी है। वन वासियों के द्वारा एक खेत में बनाने घासनुमा कच्चे कुआं से पानी भरते दिखे गये। इसमें बच्ची व महिलाओं की संख्या अधिक थी जिस कुएं से पानी भरा जा रहा था, वह जोखिम भरा था. यानि पैर फिसलने के बाद सीधे पथरीली कुएं में लोग गिर जाते है जो बेहद ही जोखिम से प्यास बूझाने पानी निकाल रहें है। इन घासनुमा कच्चे कुएं का पानी भरकर आदीवासी पेयजल, स्नान व खाना बनाने में इस्तेमाल करते हैं।
आदिवासी सावन लाल पंद्रे, कुमारसिंग ऊईके की माने तो गांव में लगभग 40 घर है, इस पर महज एक कुआं है एक चालु हैडपंप तो है लेकिन काफी दूर है जिस कारण गांव के बीचो-बीच बने कच्चे कुएं से पानी लेते हैं। इन आदिवासी क्षेत्रों के घरों मैं नल जल योजना का अब तक कोई अता पता नहीं दिखा है। गांवों के पड़ताल में सरकारी योजना का प्रतिबिंब तक नहीं दिख रहा है। प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री हर नागरिक को साफ पानी पीने का वायदा करते हर जगह दिखाई देते हैं लेकिन इन आदिवासियों के लिए बिजली ,पानी ,रोजगार सिर्फ भाषणों तक सीमित रह गया है।
आदिवासियों की माने तो जनप्रतिनिधि से लेकर प्रशासनिक अमला इन गांवों से दूर हैं. जैसे-तैसे जिंदगी कट रही है. हम आदिवासियों के लिए पेयजल की समस्या बनी हुई है पर्यावरण दूषित होने के कारण दिनों-दिन कुएं भी गहराते जा रहें है जिससे गर्मीयों के दिनों में तो पानी का अधिक संकट बना रहता है। जानकारी के मुताबिक, इन इलाकों में सदियों से पानी की तकलीफ बनी हुई है. आजादी के बाद से अबतक पेयजल संकट को दूर करने के लिए किसी प्रकार की मजबूत पहल इन गांवों में नहीं देखी गयी है।
जिम्मेदार प्रशासन व जनप्रतिनिधियों को यह समाचार प्रकाशन कर अवगत कराया जा रहा है कि ऐसे ग्रामों में नल-जल योजना के तहत शुद्ध पानी की व्यवस्था किया जावें साथ ही मूलभूत सूविधाओं से वंचित वनग्रामों में आदिवासियों को मुख्य धारा से जोड़ा जावें।

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