BY – SATISH MISHRA
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सिवनी { SAMVAD DOOT } – मुख्यालय से 24 किमी दूर दिघौरी में श्री गुरुरत्नेश्वर महादेव मंदिर मुख्यालय समेत महानगरों में ख्याति प्राप्त कर चुका है। यहां स्थापित एशिया के सबसे बड़े स्फटिक शिवलिंग के दर्शन करने दूर-दूर से श्रद्धालु पहुंचते हैं। सावन में यहां विशेष अनुष्ठान के साथ कावडि़ए गंगाजल से अभिषेक करने पहुंचते हैं। मान्यता है कि स्फटिक शिवलिंग के दर्शन करने से पापों से मुक्ति और पुण्य की प्राप्ति होती है।
शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद महाराज की जन्मस्थली दिघौरी गांव में मंदिर का निर्माण दक्षिण शैली में किया गया है। मंदिर में सीढ़ी चढऩे के बाद एक हाल में विशालनंदी विराजित हैं। इसके बाद एक गर्भगृह में स्फटिक शिवलिंग स्थापित है।
दिघोरी में स्थापित स्फटिक शिवलिंग को कश्मीर से यहां लाया गया था। बर्फ की चट्टानों के बीच कई वर्षों तक पत्थर के बीच दबे रहने के बाद ऐसा शिवलिंग निर्मित होता है। ऐसे शिवलिंग के पूजन का धर्मग्रंथों में बहुत महत्व बताया गया है।
स्फटिक शिवलिंग के दर्शन करने से पापों से मुक्ति और पुण्य की प्राप्ति होती है। जिस स्थान पर स्फटिक शिवलिंग की स्थापना हुई है उसी स्थान पर द्विपीठाधीश्वर जगतगुरू शंकराचार्य स्वरूपानंद महाराज का जन्म हुआ था। स्फटिक शिवलिंग के पूजन का धर्मग्रंथों में बहुत महत्व बताया गया है। मंदिर का निर्माण दक्षिण शैली में किया गया है।
ब्रम्हचारी रामेशानंद, पुजारी
19 साल पहले वर्ष 2002 में गुर्स्धाम दिघोरी में एशिया के सबसे बड़े स्फटिक शिवलिंग की स्थापना धर्माचार्यों की उपस्थिति में वैदिक मंत्रोच्चार के साथ हुई थी। जहां स्फटिक शिवलिंग की स्थापना हुई है उसी स्थान पर द्विपीठाधीश्वर जगतगुरू शंकराचार्य स्वरूपानंद महाराज का जन्म हुआ ।

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