36 सालों से आस्था का प्रतीक है भुरसाडोंगरी की भुवनेश्वरी माता, नवरात्री उत्सव में लगता है भक्तों का ताता

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बालाघाट।ब्रजेश मिश्रा। लांजी तहसील के अंतर्गत ग्राम भूरसाडोंगरी में स्थित दुर्गामंदिर श्रद्धालुओं की गहन आस्था का प्रतीक है। एक दौर था जब सिर्फ मूर्ति और त्रिषूल की पूजा होती थी और भक्तों की मनोकामना पूर्ति के साथ ही इस शक्तिस्थल की मान्यता चंहुओर फैलती गई, आज इस स्थान पर भुनेष्वरी देवी का पक्का मंदिर विद्यमान है।
मंदिर का गरिमामय इतिहास
इस प्राचीन ग्राम देवी का जीर्णो़द्वार सन् 1983 में हुआ था, जयपुर सें दुर्गा जी की मूर्ति लाकर सन् 1984 में प्राण-प्रतिष्ठा तथा एक कलष की स्थापना की गई थी, जिसके बाद सन् 1983 से लगातार प्रतिवर्ष कलषों की सख्ंया बड़ती गई तथा सन् 1996 के 12 वर्षो में मतस्य अवतार की भांति कलशो की सख्ंया 226 हो गई जों एक छोटे ग्राम के लिए कौतुहल का विषय बन गया था। दूर-दूर से आने वाले श्रद्वालुओं एवं कलषधारियों का तांता लग गया था।1996 के परचें में समिती द्वारा 12 वर्ष होने पर कुछ रहस्योद्घाटन भी किया जो कि कलषधारियों के अपने अनुभव थें, जिसने जितनी श्रद्धा से पूजा, फल वैसा ही मिला ऐसी मान्यताएं प्रचलित है।
नि:शुल्क संस्कार की परंपरा
इस सिद्धपीठ मनोकामना को पूर्ण करने वाली मंदिर में विगत वर्ष कलषों की सख्ंया 271 थी, इसके अलावा विशेष उल्लेखनीय है कि अष्टमी के हवन में अन्य संस्कार भी कराये जाते है, जैसे- नामकरण संस्कार,मुण्डन संस्कार, दीक्षा संस्कार, गर्भवती महिलाओं का पंसवन
संस्कार जिनकी अलग से राशि नहीं ली जाती है और यह हिंदु परंपरा का अभिन्न माना जाता है। इसके अलावा मंदिर में विभिन्न संपूर्ण नवरात्रि विभिन्न कार्यक्रमों का भी आयोजन किया जाता है।
मंदिर समिती की अपील
सावधान युग बदल रहा है अपना सुधार संसार की सबसे बडी सेवा है । अनादी काल से शक्ति की पूजा अर्चना की जाती है।देवताओं ने भी शक्ति की पूजा-ंउचयअर्चना की है तब तो हम मानव जाति का परम कत्र्तव्य हो जाता है । मनुष्य मा़त्र को संभावित विनाष से बचाकर उज्जवल भविष्य की ओर गति देने के लिए सद्भाव, सद्बुध्दि एंव सत्कर्मो से सम्पन्न बनाने के लिए देवी अनुग्रह आवष्यक है। अत:प्रतिवर्षानुसार इस वर्ष भी ग्राम भुरसाडोंगरी में दुर्गोत्सव एंव कलष स्थापना का आयोजन किया गया है। जिसमें आप भी भागीदारी लेकर इस संधि बेला का लाभ उठायें।

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