सच्चाई की आवाज दबाने के उददेश्य से पत्रकार पर जिंदल हास्पिटल के संचालक ने किया हमला

249

सिवनी – आज के दौर में पत्रकारिता करना किसी अग्निपरीक्षा से कम नही पत्रकारिता जोखिम भरा कार्य हो गया है जब पत्रकार अपने दिल की सुनता है और ईमानदारी की राह पर चलता है वह समाज क नायक कहलाता है। लेकिन जैसे ही वह अपने परिवार और अपने पेट की सोचता है तो समाज उसके उपर लाक्षनो बोछ लाद देता है। बिना वेतन के कडी धूप मूसलाधार बारिश और कडाके की ठंड में दिन रात एक कर समाज तक सच खबरो को पहुॅचाना पत्रकार आज उपेक्षा का शिकार है। क्या उसे सम्मान उसे सम्मान से जीने और सहयोग का अधिकार नही है। यह यक्ष प्रश्न आज सिवनी के गलियारो में चीख – चीख कर गूंज रहा है।
आपको बताते है क्या कुछ हुआ
बताया जाता है कि 28 दिसम्बर 2025 की सुबह लगभग 9 बजे शहर के भैरोगंज दलसागर के किनारे बने जिंदल हास्पिटल में तनाव का तनाव होने की खबर मिली की ईलाज के दौरान एक व्यक्ति की मृत्यु हो गई है जिसमें अस्पताल प्रबंधन द्वारा और मृतक के परिजनो के बीच शव सौपने को लेकर विवाद हो रहा है। अपने पत्रकारिता धर्म का निर्वहन करते हुए साप्ताहिक संवाददूत समाचार पत्र एवं संवाददूत न्यूज के प्रधान संपादक सतीश कुमार मिश्रा कवरेज करने पहुॅचे जहां पीडित परिजनो का पक्ष जान रहे थे और उसे अपने कैमरे में रिकार्ड कर रहे थे तभी उसी दौरान अस्पताल के संचालक डाक्टर सुनील अग्रवाल हास्पिटल से बाहर निकलते हुए आपा खोते हुए दुख डूबे पीडित परिजनो पर चिल्लाते हुए कहा कि मै यहा का मालिक हूॅ और अध्यक्ष हूॅं तुमको आधार कार्ड लगेगा तभी वीडियो बना रहे पत्रकार पर झल्लाते हुए कहा तू शराब पीकर मुझे ब्लेकमैल कर रहा है आरोप है इस दौरान संचालक ने पत्रकाकर का गला दबाते हुए दीवार पर पटक दिया और उसके स्टाफ के साथियो के साथ लात – घूसो से मारपीट की इतना ही नही लोकतंत्र की आवाज कहे जाने वाले माईक आईडी और कैमरे का ट्राईपोड को तोडकर फैक दिया।
इस पूरी घटना में सबसे दुखद पहलू मारपीट क बाद का था जब अनुभवी पत्रकार सतीश कुमार मिश्रा कोतवाली परिसर पहुॅचे तो उनकी आॅखे नम थी ये आॅसू उनकी शारीरिक चोट नही बल्कि मानसिक आघात के थे जो उन्हे निष्पक्ष पत्रकारिता करने परिणाम स्वरूप मिला था यह कडवी सच्चाई है कि रसूखदारो के खिलाफ खडे होने में आर्थिक और सामजिक जोखिम होता है सतीश मिश्रा का यह दर्द उनका व्यक्तिगत दर्द नही बल्कि हर उस पत्रकार का दर्द है जो सच्चाई के लिए लड रहा है।
विश्वनीय सूत्रो की माने तो जिंदल हास्पिटल और विवादो का पुराना नाता है सूत्र बताते है कि ऐसी घटनाओ के समय यहां अक्सर सीसीटीव्ही कैमरे बंद पाये जाते है या बंद कर दिये जाते है कैमरे निकाल लिए जाते है। स्थानिय लोगो का आरोप है कि यहा सेवा से ज्यादा व्यवसायिकता को महत्व दिया जाता है। यदि ईलाज के दौरान यहां किसी की मृत्यु हो जाये तो अस्पताल प्रबंधन संवेदनशीलता दिखाने के बजाय बकाया राशि वसूलने क लिए शव तक को रोकने से परहेज नही करता प्रबध्ंान का अडियल और गैरजिम्मेदाराना व्यवहार अक्सर सुर्खियो में रहता है। और इसी के चलते यह अस्पताल हमेशा विवादो में घिरा रहता है। इस घटना के बाद पत्रकारो का एक प्रतिनिधि मंडल पुलिस अधीक्षक से मिलकर अपनी शिकायत दर्ज कराते हुए मांग की कि तत्काल एफआईआर दर्ज करते हुए जिंदल हास्पिटल के संचालक सुनील अग्रवाल की शीध्रताशीघ्र गिरफतारी की जाए और मामले की निष्पक्ष जाॅच कर दोषियो के खिलाफ कडी कार्रवाई की जाए।
घटना के बाद कोतवाली थाना प्रभारी ने मामले का बयान दर्ज किये गए थे जिसकी पुलिस मामले बारीकी से जाॅच कर डाक्टर सुनील अग्रवाल के खिलाफ बीएनएस की धारा 296 ब ,115 2,351 2,324 4, और 3 ( 5 ) के तहत मामला दर्ज किया गया है।

लोकतत्र का चैथा स्तंभ कहे जाने वाले पत्रकारिता को आज खुद असुरक्षित और अकेला महसूस कर रहा है। आज समाज मंे हर वर्ग न्याय की उम्मीद रखता है तो वह पत्रकार की ओर आशा भरी नजरो से देखता है कि जब कही हमे न्याय नही मिलेगा अथवा कही से हमे प्रताडित किया जायेगा तो पत्रकार अथवा मीडिया वर्ग हमारी आवाज बनकर हमें हमारा हक दिलवायेगा और हमें न्याय मिलेगा। किंतु आज यही पत्रकार अपने अस्तित्व की लडाई लड रहे है जो सबके अधिकारो के लिए लडते है किंतु आज वह खुद को अकेला पाता है। ऐसा ही एक हृदय विदारक और आक्रोशित करने वाला मामला संवाददूत के प्रधान संपादक सतीश मिश्रा के साथ घटित हुआ जो ना केवल उनकी निष्पक्ष पत्रकारिता पर हमला था बल्कि उनके साथ की गई बदसलूकी एवं मारपीट उनकी गरिमा पर आघात करने वाली थी।