सिवनी में 80 नवजात बच्चों की मौत पर भाजपा सरकार जवाब दे 2003 से भाजपा सरकार, फिर भी सरकारी अस्पतालों में नवजातों की सुरक्षा की गारंटी क्यों नहीं?
सिवनी – आज मैं किसी राजनीतिक आरोप के लिए नहीं, बल्कि उन 80 परिवारों की पीड़ा आपके सामने रखने आया हूँ, जिन्होंने अपने नवजात बच्चों को सरकारी अस्पताल में इलाज के लिए भर्ती कराया, लेकिन उन्हें वापस जीवित नहीं ला सके शनिवार को आयोजित प्रेस वार्ता को संबोधित करते हुए कांग्रेस के वरिष्ठ नेता राजा बघेल ने बताया कि एक गरीब परिवार अपने नवजात बच्चे को बचाने की उम्मीद लेकर जिला अस्पताल जाता है।
उसे भरोसा होता है कि वहाँ डॉक्टर होंगे, प्रशिक्षित नर्से होंगी, आवश्यक मशीनें होंगी और सरकार ने इलाज की पूरी व्यवस्था की होगी।
लेकिन जब वही परिवार अपने बच्चे को खो देता है, तो उसका दर्द शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता।
सिवनी जिला अस्पताल के एसएनसीयू में अप्रैल से सितंबर 2026 के बीच 80 नवजात बच्चों की मौत का मामला सामने आया है।
यह केवल एक आँकड़ा नहीं, बल्कि 80 परिवारों का दुःख और सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था पर गंभीर सवाल है।
मीडिया रिपोर्टों के अनुसार अस्पताल प्रशासन का कहना है कि कई बच्चे कम वजन के थे, समय से पहले जन्मे थे और गंभीर हालत में रेफर होकर आए थे। हम इन तथ्यों से इनकार नहीं करते। यह भी सच है कि हर गंभीर नवजात को बचाना हमेशा संभव नहीं होता।
लेकिन हमारा सीधा सवाल है –
क्या हर बच्चे को बचाने के लिए पूरी कोशिश की गई? क्या डॉक्टर समय पर मौजूद थे? क्या सभी आवश्यक मशीनें कार्यरत थीं? क्या उपचार में किसी स्तर पर देरी हुई? क्या हर मृत्यु का वैज्ञानिक और स्वतंत्र ऑडिट हुआ?
इन सवालों का जवाब सरकार को देना होगा।
मध्य प्रदेश में वर्ष 2003 से, बीच के कांग्रेस शासनकाल को छोड़कर, भाजपा दो दशक से अधिक समय तक सत्ता में रही है।
इतने लंबे शासन के बाद यदि जिला अस्पतालों में नवजातों की सुरक्षा, डॉक्टरों की उपलब्धता और उपचार व्यवस्था पर गंभीर प्रश्न उठ रहे हैं, तो सरकार अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकती।
सरकार केवल भवन और घोषणाओं से नहीं चलती। उसकी सबसे बड़ी जिम्मेदारी नागरिकों की जान बचाना है-विशेषकर उन नवजात बच्चों की, जो स्वयं अपनी तकलीफ भी नहीं बता सकते।
छह महीने के तथ्य
आधिकारिक दस्तावेजों और मीडिया रिपोटों के आधार पर एसएनसीयू में भर्ती नवजात – 1,088 दर्ज नवजात मृत्यु – 80 मृत्यु दर – लगभग 7.4 प्रतिशत कम वजन वाले मृत नवजात – 60 समय से पहले जन्मे मृत नवजात – 58 जन्म के दौरान ऑक्सीजन की कमी (भ्प्म्) से जुड़े मामले – 22 सिवनी जिला अस्पताल में जन्मे मृत नवजात – 39 अन्य अस्पतालों से रेफर होकर आए मृत नवजात – 41
इन श्रेणियों में कई बच्चे एक से अधिक श्रेणियों में शामिल हो सकते हैं, इसलिए इन्हें जोड़कर कुल मृत्यु संख्या नहीं निकाली जा सकती।
सरकार कह सकती है कि मृत्यु दर निर्धारित सीमा से कम है। लेकिन केवल प्रतिशत बता देने से जिम्मेदारी समाप्त नहीं हो जाती।
असल सवाल यह है कि –
प्रत्येक बच्चे को समय पर उपचार मिला या नहीं? पर्याप्त डॉक्टर और नर्स उपलब्ध थे या नहीं? मृत्यु के वास्तविक कारण क्या थे? क्या प्रत्येक मामले की स्वतंत्र चिकित्सकीय समीक्षा हुई?
इन्हीं प्रश्नों के उत्तर जनता जानना चाहती है।
पिछले वर्षों के आँकड़े क्या बताते हैं?
उपलब्ध रिपोर्ट के अनुसार पिछले वर्षों में मृत्यु दर लगातार एक जैसी नहीं रही।
वर्ष मृत्यु दर
2020-21 13.4ः
2021-22 9.6ः
2022-23 8.7ः
2023-24 5.8ः
2024-25 6.0
2025-26 6.6ः
2026-27 (सितंबर तक) 7.4ः
इन आँकड़ों से स्पष्ट है कि मृत्यु दर में उतार-चढ़ाव रहा है। छह महीने के आँकड़ों की पूरे वर्ष से सीधी तुलना उचित नहीं होगी, लेकिन यह प्रश्न अवश्य उठता है कि यदि किसी अस्पताल में लगातार नवजात मृत्यु हो
रही हैं तो सरकार और स्वास्थ्य विभाग ने समय रहते समीक्षा और सुधार क्यों नहीं किए?
यदि व्यवस्था पूरी तरह संतोषजनक थी तो जांच टीम द्वारा ड्यूटी रोस्टर, मृत्यु ऑडिट, उपकरणों की निगरानी और रिकॉर्ड प्रबंधन में सुधार की सिफारिशें क्यों करनी पड़ीं?
भाजपा विधायक दिनेश राय मुनमुन से सवाल
सिवनी के विधायक दिनेश राय मुनमुन स्वयं भाजपा के विधायक हैं।
मीडिया रिपोर्टों के अनुसार उन्होंने अस्पताल का निरीक्षण किया और मुख्यमंत्री से जांच कराने की मांग की। यह स्वागत योग्य कदम है।
लेकिन जनता उनसे कुछ सीधे सवाल पूछना चाहती है –
क्या अस्पताल में डॉक्टरों या स्टाफ की कमी की शिकायत पहले भी मिली थी? यदि मिली थी तो आपने क्या कार्रवाई कराई? क्या आपने अस्पताल की मृत्यु दर और संसाधनों की कभी समीक्षा की? क्या आपने स्वीकृत और कार्यरत डॉक्टरों तथा नर्सों का विवरण माँगा? क्या अब आप पूरी जांच रिपोर्ट और मृत्यु ऑडिट सार्वजनिक कराने की मांग करेंगे? जब सरकार अपनी ही पार्टी की हो, तब जनता के प्रति जवाबदेही और अधिक बढ़ जाती है।
सरकार के स्पष्टीकरण पर हमारा प्रश्न
सरकार का कहना है कि कई बच्चे कम वजन वाले थे, समय से पहले जन्मे थे और गंभीर अवस्था में भर्ती हुए थे। हम इन चिकित्सकीय तथ्यों से इनकार नहीं करते।
लेकिन केवल बीमारी या कम वजन का उल्लेख कर देना पर्याप्त नहीं है।
सरकार को यह बताना होगा –
भर्ती के समय बच्चे की वास्तविक स्थिति क्या थी? उपचार कितनी जल्दी शुरू हुआ? कौन-कौन से चिकित्सकीय हस्तक्षेप किए गए? क्या आवश्यक उपकरण उपलब्ध थे? क्या किसी स्तर पर उपचार में देरी हुई?
हर बच्चे के मामले का रिकॉर्ड आधारित उत्तर जनता को मिलना चाहिए।
एनएचएम की 2025 गाइडलाइन क्या कहती है? भारत सरकार के राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन ने 2025 में सस्थागत नवजात देखभाल
देखभाल परिचालन दिशानिर्देश मे जारी की हैं।
इन गाइडलाइन में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि एसएनसीयू में – पर्याप्त प्रशिक्षित डॉक्टर उपलब्ध हों, पर्याप्त नर्सिंग स्टाफ हो, आवश्यक उपकरण कार्यरत हों, संक्रमण नियंत्रण की व्यवस्था हो, मृत्यु ऑडिट नियमित हो, और गंभीर बच्चों के लिए प्रभावी रेफरल व्यवस्था हो।
हम यह दावा नहीं कर रहे कि सिवनी अस्पताल ने इन मानकों का उल्लंघन किया है। लेकिन सरकार को रिकॉर्ड सहित यह बताना चाहिए कि – कितने डॉक्टर स्वीकृत थे? कितने वास्तव में कार्यरत थे? प्रत्येक शिफ्ट में कितने डॉक्टर और नर्स मौजूद थे? कितने उपकरण उपलब्ध थे? कितने उपकरण कार्यशील थे? कितने बेड स्वीकृत और चालू थे? क्या मरीजों की संख्या के अनुरूप संसाधन पर्याप्त थे? यदि सब कुछ मानकों के अनुसार था तो सरकार रिकॉर्ड सार्वजनिक करे।
यदि कहीं कमी थी तो जनता को बताया जाए कि उसे दूर करने के लिए क्या कार्रवाई की गई।
जांच रिपोर्ट और मृत्यु ऑडिट पर सरकार जवाब दे
जानकारी के अनुसार पांच डॉक्टरों की जांच समिति ने सिवनी एसएनसीयू की व्यवस्था की समीक्षा की। रिपोर्ट में ड्यूटी रोस्टर के पालन, नियमित नवजात मृत्यु समीक्षा, 48 घंटे के भीतर डेथ ऑडिट, उपकरणों की तकनीकी जांच और एसएनसीयू पोर्टल पर आंकड़ों की नियमित निगरानी जैसे सुधारों की आवश्यकता बताई गई।
हम यह नहीं कह रहे कि सुधार की सिफारिश होने का अर्थ स्वतः लापरवाही सिद्ध हो जाना है। लेकिन यदि जांच समिति सुधार की जरूरत बताती है, तो सरकार को यह स्पष्ट करना चाहिए कि ये कमियां क्यों सामने आई और इन्हें दूर करने के लिए अब तक क्या कार्रवाई हुई।
भारत सरकार की संस्थागत नवजात शिशु देखभाल परिचालन दिशानिर्देश – 2025 में प्रत्येक नवजात मृत्यु की समयबद्ध सूचना और चिकित्सकीय समीक्षा का स्पष्ट प्रावधान है। इसलिए सरकार से हमारे कुछ सीधे सवाल हैं-
क्या सभी 80 नवजात मृत्यु की सूचना निर्धारित समय के भीतर दी गई? क्या प्रत्येक मामले का डेथ ऑडिट हुआ? क्या किसी मामले में उपचार में देरी, स्टाफ की कमी या उपकरणों की समस्या सामने आई? 6 जांच समिति की सिफारिशों पर अब तक क्या कार्रवाई की गई? जनता को केवल आश्वासन नहीं, बल्कि रिकॉर्ड आधारित जवाब चाहिए।
डिस्चार्ज प्रमाणपत्र और रिकॉर्ड पर उठे सवाल
इस मामले में काग्रेंस के वरिष्ठ नेता राजा बघेल ने बताया कि हमारे सामने राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन, मध्य प्रदेश का 21 मार्च 2024 का एक विभागीय आदेश भी है, जिसमें एक पुराने मामले में डिस्चार्ज प्रक्रिया और ड्यूटी के संबंध में लापरवाही का उल्लेख किया गया था।
आपको बता दे कि यह 2024 का अलग मामला है। इससे यह सिद्ध नहीं होता कि 2026 की नवजात मौतें उसी कारण हुईं या वर्तमान में कोई विशेष व्यक्ति दोषी है।
लेकिन हाल में पहले से हस्ताक्षरित खाली डिस्चार्ज प्रमाणपत्रों के उपयोग को लेकर भी आरोप सामने आए हैं। इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध दस्तावेजों से नहीं होती, इसलिए निष्पक्ष जांच आवश्यक है।
मांग की गई है कि – डिस्चार्ज रिकॉर्ड, उपचार संबंधी दस्तावेज, ड्यूटी रजिस्टर, और संबंधित अधिकारियों की भूमिका की निष्पक्ष जांच कराई जाए। यदि किसी स्तर पर नियमों का उल्लंघन सिद्ध होता है तो कानून के अनुसार कार्रवाई हो।
डॉ. पारस पटेरिया और प्रभारी बदलने का मामला
डॉ. पारस पटेरिया ने अपने आवेदन में कहा है कि उनके कार्यकाल में ैछब्न् की मृत्यु दर लगभग छह प्रतिशत रही और उन्हें राजनीतिक कारणों से परेशान किया जा रहा है।
दूसरी ओर, मीडिया रिपोर्टों के अनुसार जांच समिति की सिफारिश के बाद ैछब्न् का प्रभार बदलकर नए प्रभारी की नियुक्ति की गई।
हमारा स्पष्ट मत है-
किसी अधिकारी को हटाना यह सिद्ध नहीं करता कि वही दोषी है। और किसी अधिकारी का यह कहना कि मृत्यु दर कम थी, यह भी सिद्ध नहीं करता कि अस्पताल की पूरी व्यवस्था संतोषजनक थी।
हम किसी व्यक्ति विशेष के खिलाफ नहीं हैं। हमारी मांग केवल निष्पक्ष जांच की है।
जांच यह बताए – किसकी ड्यूटी थी? कौन उपस्थित था? कौन-सी मशीनें कार्यरत थीं? उपचार कब शुरू हुआ? मृत्यु समीक्षा में क्या निष्कर्ष निकले? सरकार यह भी बताए कि प्रभारी बदलने के बाद अस्पताल की व्यवस्था में क्या सुधार हुआ। मध्य प्रदेश की अन्य घटनाओं से भी सीख लेनी चाहिए
पिछले कुछ वर्षों में मध्य प्रदेश में कई ऐसी घटनाएं सामने आई हैं जिन्होंने सरकारी व्यवस्थाओं पर गंभीर प्रश्न खड़े किए हैं।
इंदौर के एमवाय अस्पताल में नवजातों की सुरक्षा को लेकर सवाल उठे। छिंदवाड़ा में दूषित कफ सिरप का मामला सामने आया। सागर में संदिग्ध अवैध शराब से कई लोगों की मौत हुई। इंदौर के भागीरथपुरा में दूषित पानी के मामले में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग और बाद में हाईकोर्ट को हस्तक्षेप करना पड़ा।
इन सभी मामलों के कारण अलग-अलग हैं, इसलिए इन्हें एक जैसा नहीं माना जा सकता।
लेकिन एक समान प्रश्न अवश्य उठता है – क्या सरकार समय रहते निगरानी कर रही है? क्या खतरे की पहचान समय पर होती है? क्या जवाबदेही तय होती है?
मध्य प्रदेश में भाजपा दो दशक से अधिक समय तक सत्ता में रही है। इतने लंबे शासन के बाद भी यदि अस्पताल, दवाओं, पेयजल और अन्य आवश्यक सेवाओं पर बार-बार सवाल उठ रहे हैं, तो सरकार को गंभीर आत्ममंथन करना चाहिए।
हमारी 10 प्रमुख मांगें
आज हम मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव, स्वास्थ्य विभाग, जिला प्रशासन और स्थानीय विधायक के सामने निम्न मांगें रखते हैं-

  1. सिवनी एसएनसीयू में दर्ज सभी 80 नवजात मृत्यु मामलों का स्वतंत्र चिकित्सकीय ऑडिट कराया जाए।
  2. जांच समिति की पूरी रिपोर्ट और उस पर की गई कार्रवाई सार्वजनिक की जाए।
  3. डॉक्टरों, नर्सों और अन्य कर्मचारियों के स्वीकृत पद, कार्यरत संख्या, ड्यूटी रोस्टर और उपस्थिति रिकॉर्ड सार्वजनिक किए जाएं।
  4. एसएनसीयू में उपलब्ध उपकरणों, उनकी कार्यशील स्थिति और रखरखाव का विवरण सार्वजनिक किया जाए।
  5. भर्ती, रेफरल, डिस्चार्ज और मृत्यु के रिकॉर्ड का पूरा मिलान सार्वजनिक किया जाए।
  6. एनएचएम की 2025 एफबीएनसी गाईडलाईन के अनुसार अस्पताल की स्वतंत्र समीक्षा कराई जाए।
  7. डिस्चार्ज प्रमाणपत्रों से जुड़े आरोपों की निष्पक्ष जांच कराई जाए।
  8. प्रत्येक प्रभावित परिवार को मृत्यु समीक्षा का निष्कर्ष उचित प्रक्रिया के अनुसार उपलब्ध कराया जाए।
  9. यदि किसी स्तर पर लापरवाही सिद्ध होती है तो संबंधित अधिकारियों के विरुद्ध नियमों के अनुसार कार्रवाई की जाए।
  10. अस्पताल की कमियों को दूर करने के लिए समयबद्ध कार्ययोजना बनाई जाए और उसकी प्रगति सार्वजनिक की जाए।
    गरीब परिवार सरकारी अस्पताल में अपने बच्चे को बचाने की उम्मीद लेकर जाता है। सरकार की जिम्मेदारी है कि वह उस भरोसे को मजबूत करे।
    सिवनी के परिवारों को न्याय चाहिए। जनता को सच चाहिए। और भविष्य में किसी भी परिवार को ऐसी पीड़ा न झेलनी पड़े, इसके लिए स्वास्थ्य व्यवस्था में ठोस सुधार होना चाहिए। यदि जांच में किसी भी स्तर पर लापरवाही सामने आती है, तो कानून के अनुसार कार्रवाई हो चाहे जिम्मेदार व्यक्ति कितना भी प्रभावशाली क्यों न हो। यही हमारी मांग है।