सिवनी – पूरे भारत में प्रतिवर्ष अन्धविश्वास के चक्कर में जाने कितने लोगो को अपनी जान गवानी पडती है और जाने कितने लोग ठगी का शिकार होने के साथ ही अपराध कितने होते है और लोगो को झाडफूॅक करने के बाहने कितने ठगो के शिकार भोले भाले लोगो को अपनी हवस का शिकार बनाया जाता है जिसके चलते जाने कितने लोग अच्छा खासा पैसा भी ढोगियो को दे देते है।
सरकार द्वारा अन्धविश्वास से बचने चलाये जा रहे है अभियान
अन्धविश्वास से बचने लिए सरकार द्वारा कई तरह के जनजागरूकता के अभियान चलाये जाते है लेकिन फिर भी लोग अन्घविश्वास के चक्कर में आकर समय तो बर्बाद करते ही है साथ ही पास रखी अच्छी खासी पूॅजी से भी हाथ धो बैठते है।
कुछ ऐसा ही देखने और सुनने को मिला जबलपुर रोड स्थित बंजारी में आस्था और अंधविश्वास के बीच जो बारीक लकीर बनी हुई है उसे अन्धविश्वास पर भरोसा करने वाले लोगों ने ही बनाई है। उन्हे लगता है कि कोई ऐसा चमत्कार हो जाये और सारी तकलीफे एक झटके में झट से खत्म हो जाएं।
हमारी कमजोर नसो को पकड लेते है ढोंगी पाखंडी
जब हमारी इन भावनाओं को कोई अवसरवादी ढोंगी पाखंडी पढ़ लेता है तब ऐसे ही कम्बल वाले बाबाओं का जन्म होता है,कोई कंबल ओढ़ाकर लकवा , पोलियो, कैंसर जैसी बीमारियों को ठीक करने का दावा करने लगते हैं। तो कोई पीटकर तो कोई हाथ फेरकर बीमारी ठीक होने का दावा करते है ऐसे में पीड़ित व्यक्ति का मन मष्तिष्क अक्सर भावुक हो जाता है, वह हर जगह उम्मीद भरी निगाहो से देखता है। और यही उम्मीद उसे आस्था, अंधविश्वास और वास्तविकता के बीच दीवार खडा कर देती है। प्रचारित है कि कंबल वाले बाबा कंबल से पोलियो जैसी बीमारी ठीक कर देते हैं, लेकिन ठीक होने वालों के सटीक आकंड़े क्या कंबल वाले बाबा के पास है। प्रचार का परिणाम ऐसा है कि ठीक होने की उम्मीद में भीड़ का हिस्सा बनने वालों के स्पष्ट आंकड़े भी किसी के पास नही है।
जिसे सच्चाई सामने लाना चाहिए वे ही कर रहे अन्धविश्वास का प्रचार – प्रसार
सोशल मीडिया की सीढ़ी पर चढ़कर कंबल वाले बाबा का प्रचार कई प्रदेशो तक पहुँच गया और अब बाबा कंबल ओढ़ाने के लिए सिवनी में सेवाएं दी हैं, जिन्हें एक वर्ग पीड़ित मानवता की सेवा की संज्ञा दे रहा है। जो पीड़ित मानव यहाँ से कंबल ओढ़कर निकले हैं उनकी खबर कौन लेगा…कि वे अब स्वस्थ्य जीवन जी रहे हैं या अब भी पीड़ित मानव हैं।
अन्धविश्वास के भागीदार कर रहे प्रशासन से व्यवस्था की मांग
सिवनी के जिस स्थान पर कंबल वाले बाबा का दरबार लगा था वहां विडम्बना देखिए कि जो लोग अंधविश्वास के चलते यहां कि अव्यवस्था के भागीदार बने हैं वही लोग प्रशासन से व्यवस्था बनाने की मांग कर रहे हैं। यहां लोग कह रहें थे कि पुलिस बल बढ़ाकर यातायात और भीड़ को नियंत्रित किया जाए ताकि सभी लोगो को इलाज मिल सके और कोई निराश न लौट सके। बीते एक दशक में सिवनी में अंधविश्वास (खटिया चलने) की घटनाओं को बड़े प्रयास के बाद मुक्ति मिल पाई थी।
एक बाबा लोगो को उढा रहा कंबल तो प्रशासन सो रहा रजाई ओढ
लेकिन अब कंबल वाले बाबा ने सिवनी में एक नई शुरुआत कर दी है, साथ ही चमत्कार से इलाज और दवाओं से इलाज वालो के बीच मे वर्गीकरण भी कर दिया है। बहरहाल बाबा अब तक हजारों को कंबल ओढ़ा चुके हैं वहीं दूसरी तरफ यहां का प्रशासन खुद रजाई ओढ़कर सो रहा है जो कि अंधविश्वास को थोक के भाव मे बढ़ाने वाले ऐसे शिविर को अनुमति दिया जाना इसका पहला प्रमाण है। जब अपने जिले में झोलाछाप डॉक्टर पर कार्यवाही के लिए प्रशासन को जागने में बरसों लग जाते हैं तो फिर यह स्पष्ट संकेत है कि आने वाले समय मे सिवनी में कंबल वाले बाबा की नई ब्रांच या स्थायी शिविर की जगह जरूर बनेगी जो अच्छे संकेत नही है।
जब लोग कबंल खटिया तकिया से ठीक हो रहे हो तो फिर चिकित्सक की क्या जरूरत
अब सवाल यह खडा होता है कि पूरे मध्यप्रदेश में सीईआईसी के डेटा के मुताबिक वर्ष 2022 में शासकीय चिकित्सको की संख्या 45 लाख 87 हजार थी इसके अलावा निजी डाक्टरो की संख्या तो अलग है इसके अलावा मेडिकल स्टाफ जो सरकारी चिकित्सको में कार्य करता है आफिस में कार्य करने वाले लोग के साथ आयुर्वेदिक स्टाफ होम्यापैथी से ईलाज करने वालो के स्टाफ के अलावा अन्य शासकीय चिकित्सको की बात करे तो सरकार का बजट करोडो में जाता है जो सिर्फ लोगो का ईलाज मुफत में करने के लिए सरकार द्वारा उपलब्ध कराया जाता है। यदि लोग खटिया, कंबल, कथरी, तकिया से ठीक होने लगेंगे तो फिर पूरे मध्यप्रदेश के सारे मेडिकल हास्पिटल बंद हो जाने चाहिए।
दुनिया कहां से कहां पहुॅच गई लेकिन हम अभी भी वही की वही
अभी तो कंबल वाले बाबा का दरबार बंजारी से उठ गया। आगे आदेगांव में कंबल वाले बाबा से मुलाकात होगी सुनने में आ रहा है कि अगले महीने का कार्यक्रम बन रहा है। कंबल वाले बाबा के इस शिविर में बड़ी संख्या में लोगों की भीड़ इकटठी हुई। इतनी बडी संख्या साबित करती है कि अब भी चांद पर यान भेजने के बावजूद हम जमीन में कितने नीचे तक धसे हुए हैं। सिवनी विधायक दिनेश राय मुनमुन जिले में मेडिकल बनाने के नाम पर भाजपा में शामिल हुए। उनके अथक मेहनत प्रयास और परिश्रम के बाद जिले में अब जाकर मेडिकल काॅलेज प्रारंभ हो पाया है लेकिन लगता यह है कि हमें मेडिकल की जरूरत ही नहीं है।
जिनका काम अन्धविश्वास को रोकना है वही कर रहे इसका प्रचार – प्रसार
बीते तीन चार दिनों तक जिले में कंबल का खूब जादू चला। मीडिया के कुछ भाइयों ने भी इसका चाहे अनचाहे खूब प्रचार प्रसार भी किया। बीच जंगल में बने बंजारी मंदिर में भारी भीड़ उमड़ती रही और प्रशासन जिसका काम अंधविश्वास पर रोक लगाने का है वो इसकी व्यवस्थाओं में लगा रहा। पुलिसकर्मी इस स्थान पर अपनी सेवाएं देते नजर आए। दरअसल अंधविश्वास और आस्था के बीच एक बिल्कुल ही नाजुक सी लकीर होती है और कब आस्था अंधविश्वास में परिवर्तित हो जाती है इसका भान हमें नहीं हो पाता। ऐसे में जिम्मेदारी होती है मीडिया की कि वह इस अंतर के प्रति लोगों को जागरूक करे लेकिन इस युग में मीडिया अपनी जिम्मेदारी के प्रति कितना जागरूक है इसका अंदाजा अब सवा करोड देशवासियों को होने लगा है।
हर जगह स्वास्थ्य सेवाये होने के बाद भी लोग सुविधाओ से है वंचित
जिले की बात करें तो यहां पर एक मेडिकल, एक जिला अस्पताल, आठ ब्लाकों में सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र, गांव गांव में पीएचसी और सीएचसी जैसी स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध है, और दावा है कि घर-घर स्वास्थ्य सेवा उपलब्ध है उसके बाद भी पलारी जैसे गांवों में जहां के अस्पताल को प्रदेश स्तर पर सराहा जा चुका है वहां पर झोलाछाप डॉक्टर के उपचार से एक बच्चे की मौत हो जाती है और कोई कार्रवाई नही हो पाती है ऐसे में सोचना बेमानी होगा कि हम इस पिनक से बाहर निकलने को आतुर हैं। बमुश्किल कुछ ही साल हुए हैं कि जिले को खाट चलने वाली बीमारी से मुक्ति मिली है और अब कंबल की बीमारी शुरु हो गई है। जिस तरह से छपारा में कंबल को प्रसिद्धि मिली है वैसे ही आगामी दिनों में चादर वाले, रजाई वाले, तकिया वाले, फट्टी वाले जैसे कई चमत्कारिक पुरुष नजर आ सकते हैं। ऐसे में जिला प्रशासन, जिले के जिम्मेदारों, अधिकारियों, राजनेताओं को चाहिए कि वे मेडिकल, अस्पतालों को बंद कर दें और जिले की चार छह लाख जनता को छोड़ दें इस तरह के चमत्कारों के जरिए ईलाज कराने को। वैसे भी जिले में हर साल आधा सैकड़ा प्रसूताओं, एक सैकड़ा नवजातों की मृत्यु हो जाती है। वहीं सर्प दंश से आधा सैकड़ा से एक सैकड़ा लोगों की मौत झाड़फूंक जैसे कारणो से हो जाती है ऐसे में क्या जरूरत है अस्पतालों की, करोड़ों रुपए की सैलरी पाने वाले चिकित्सकों, नर्सेस और दूसरे स्टाफ की।
लक्ष्मणजी को भी ठीक करने आये थे चिकित्सक सुषेन वैघ
चलते – चलते आपको बता दे रामचरित मानस में एक प्रसंग आया जहां पर अन्धविश्वास से बचने भगवान श्री राम लक्ष्मण का एक प्रसंग आया जहां रावण के पुत्र मेघनाद के द्वारा लक्ष्मणजी को शक्ति लगी तब भगवान राम चाहते तो एक पल में लक्ष्मणजी को ठीक कर सकते थे लेकिन तब भी भगवान ने हनुमानजी को लंका से सुषेन वैद्य को लाने के लिए कहा जिसके बाद वैद्यजी ने जो दवा बताई उसके बदले हनुमानजी ने पूरा पर्वत ही उठा लाया और कहा इसमें लक्ष्मणजी के ईलाज में जो दवा उचित है उसे ले लीजिए और उनका ईलाज कीजिए जब उस युग में भी अन्धविश्वास नही था तो अब कहा से और कब आ गया पता नही।







