’’सहकारिता महा-विस्फोट सिवनी के सातों ब्लॉकों में अन्नदाता का फूटा गुस्सा, 13,300 की पगार वालों के कुबेरी साम्राज्य पर सीधे सवाल!’’
’’धूमा/लखनादौन/घंसौर/सिवनी/छपारा/बरघाट/कुरई/केवलाारी’’“जय किसान, जय बलराम किसान एकता जिंदाबाद”
सिवनी।’’ लोकतंत्र के चैथे स्तंभ की इस सबसे सनसनीखेज और निष्पक्ष खोजी रिपोर्ट में आज सिवनी जिले की सहकारिता व्यवस्था का वह खौफनाक और घिनौना चेहरा बेनकाब करने जा रहे है, जिसने जिले के लाखों सीधे-साधे अन्नदाताओं को आर्थिक तबाही और भीषण आक्रोश के मुहाने पर लाकर खड़ा कर दिया है। शासन-प्रशासन जिस सहकारिता आंदोलन को ग्रामीण अर्थव्यवस्था और किसानों की समृद्धि की रीढ़ बताता है, सिवनी जिले में उसी पवित्र तंत्र को संस्थागत वित्तीय डकैती और सिंडिकेट राज का अड्डा बना दिए जाने के संगीन आरोप लग रहे हैं।


इस पूरे कथित भ्रष्टाचार, तानाशाही और अवैध साम्राज्य के केंद्र में सहकारिता विभाग के जिला प्रभारी उप-रजिस्ट्रार (असिस्टेंट रजिस्ट्रार) घनश्याम डेहरिया, लखनादौन क्षेत्र के तुलसीराम डेहरिया और सहकारिता तंत्र के रसूखदार प्रशासक कमलेश मरावी के नाम सबसे प्रमुखता से उछल रहे हैं। किसान संगठनों और धरातली साक्ष्यों के अनुसार, लखनादौन के कतिपय दागी प्रबंधकों और उप-रजिस्ट्रार के बीच पारिवारिक, अनैतिक और मलाईदार गठनजोड़ के सीधे आरोप हैं। आरोप यहाँ तक हैं कि इस रसूखदार संरक्षण की छत्रछाया में रक्षक ही भक्षक बनकर समूचे प्रशासनिक तंत्र की साख का सरेआम कत्ल कर रहा है।
सहकारिता की मूल आत्मा का कत्ल नीति बनाम हकीकत
सहकारिता का स्वर्णिम मूल सिद्धांत है एक सबके लिए, सब एक के लिए और बिना सहकार नहीं उद्धार। नियमानुसार प्राथमिक कृषि साख सहकारी समितियों (पीएसीएस) को किसानों को शून्य प्रतिशत या न्यूनतम ब्याज पर ऋण, समय पर यूरिया-खाद और फसलों (मूंग, धान, गेहूं) का सही उपार्जन मूल्य बिना किसी मानसिक और आर्थिक प्रताड़ना के उपलब्ध कराना चाहिए।
लेकिन सिवनी जिले के सातों ब्लॉकों (’’लखनादौन, घंसौर, छपारा, सिवनी, बरघाट, कुरई, और केवलाारी’’) की सोसायटियों से आ रही चीखें और लिखित शिकायतें इस नीति का सरेआम चीरहरण कर रही हैं। किसान नेताओं का खुला आरोप है कि यहाँ सहकारिता अब किसानों के उद्धार का साधन नहीं, बल्कि कुछ चुनिंदा सफेदपोश रसूखदारों और उनके चहेते कठपुतली प्रबंधकों के निजी आर्थिक अभ्युदय और अकूत काली कमाई का जरिया बन चुकी है।


घंसौर और नागनदेवरी में प्रशासक राज का महा-खुलासा
इस खोजी अभियान में सबसे चैंकाने वाला तथ्य घंसौर और नागनदेवरी समितियों से सामने आया है। नियमों के मुताबिक समितियों के सुचारू संचालन और पारदर्शिता की निगरानी के लिए जिन प्रशासकों की नियुक्ति की जाती है, वे ही आज गंभीर शिकायतों के कटघरे में खड़े नजर आ रहे हैं।
किसान संगठनों का सीधा और तल्ख आरोप है कि नागनदेवरी और घंसौर के प्रशासक समितियों में हो रही अंधेरगर्दी, मनमानी हिस्सा राशि की कटौती और ब्याज के मकड़जाल को देखकर भी धृतराष्ट्र की तरह मौन साधे हुए हैं। घंसौर अंचल के किसानों ने तीखे सवाल उठाए हैं कि क्या प्रशासक की नाक के नीचे चल रहे इस खेल में उनकी मूक सहमति है या फिर उप-रजिस्ट्रार के कथित रसूख के आगे प्रशासक की कलम पूरी तरह नतमस्तक हो चुकी है? नगनदेवरी और घंसौर में ऋण समायोजन और मूंग उपार्जन के नाम पर जो पर्दे के पीछे का खेल चल रहा है, उसमें प्रशासक कमलेश मरावी और संबंधित प्रबंधकों की जवाबदेही तय होना अब बेहद लाजमी है।
यक्ष प्रश्न 13,300 की मामूली पगार और करोड़ों के साम्राज्य का वित्तीय रहस्य?


इस पूरे तंत्र की सबसे हैरान और आक्रोशित करने वाली हकीकत इन सोसायटियों के कुछ दागी प्रबंधकों और सेल्समैनों की राजा-महाराजाओं जैसी आलीशान जीवनशैली है। किसान संगठनों ने सीधे तौर पर व्यवस्था की छाती पर पैर रखकर यह तीखा सवाल दागा है
’ ’’अन्नदाता का बड़ा सवाल’’ सरकारी रिकॉर्ड के मुताबिक जिन सेल्समैनों और प्रभारी प्रबंधकों की आधिकारिक मासिक तनख्वाह महज 13,300 है, उनके पास रातों-रात आलीशान मकान, चमचमाती लग्जरी गाड़ियाँ और बेनामी संपत्तियों के पहाड़ कहाँ से आ गए?
हर साल विदेशो की यात्रा कई ऐसे प्रबंधक भी है जो प्रतिवर्ष विदेश यात्रा कर रहे है जिससे आप अंदाजा लगा सकते है कि इनकी मूल तनख्वाह से इनके पास काला धन आखिर आ कहां से रहा है जिससे 13 हजार की तनख्वाह पाने वाला व्यक्ति हर साल विदेश यात्रा कर रहा है विदेश यात्रा तो छोड दीजिए साहब आदमी किसी तरह अपने बच्चो को सरकारी स्कूल में पढाते हुए किसी तरह अपना और अपने परिवार का गुजर बसर कर ले इतना ही काफी है लेकिन एक – एक प्रबंधक के पास एक से बढकर एक लक्जरी कारें इनके पास तो छोड दो इनके बच्चो के लिए इन लोगो ने लक्जरी कार लक्जरी बंगले मिल ही जायेंगे।
यदि इनकी सूक्ष्मता से जाॅच की जाए तो अकूत सम्पत्ति का राज खुल जायेगा देश का सबसे अधिक तनख्वाह पाने वाले व्यक्ति के द्वारा जीवन भर की कमाई से कही कई गुना अधिक सम्पत्ति इन प्रबंधको के पास मिल जायेगी जिससे पता चल सकेगा कि इन डकैतो ने कैेसे अपने ही देश के गरीब अन्नदाता के जेब में डाका डाला है उनका खून पिया है उनके खून पसीने को कैसे निचोड कर विलासिता और अययौशी भरी जिंदगी जी रहे है।
’ किसान संगठनों का सीधा और नश्तर जैसा आरोप है कि सीधे-साधे और अनपढ़ आदिवासी-ग्रामीण किसानों के हक के पैसों पर दिन-दहाड़े डाका डालकर इन तिजोरियों को अवैध काली कमाई से ठसाठस भरा गया है, जिसकी उच्च स्तरीय निष्पक्ष ईओडब्ल्यू (ईओडब्लू) या लोकायुक्त जांच होना अत्यंत अनिवार्य है।