दक्षिण में भगवान कार्तिकेय का निवास भक्तों के कल्याण की दिव्य लीला – ब्रह्मचारी जी
माता-पिता से रुष्ट होकर नहीं, दक्षिण भूमि के कल्याण के लिए गए थे कार्तिकेय – भगवान की प्रत्येक लीला के पीछे छिपा है लोकमंगल का संदेश
सिवनी। स्मृति लॉन में चल रही श्री शिव महापुराण कथा के षष्ठ दिवस श्रद्धा, भक्ति और आध्यात्मिक ज्ञान की त्रिवेणी प्रवाहित हुई। कथा व्यास ब्रह्मचारी श्री निर्विकल्प स्वरूप जी महाराज ने भगवान कार्तिकेय जी के दक्षिण दिशा में निवास करने के प्रसंग का अत्यंत रोचक एवं दार्शनिक विवेचन करते हुए कहा कि भगवान की प्रत्येक लीला सामान्य दृष्टि से भले ही एक घटना प्रतीत हो, किंतु उसके पीछे लोककल्याण और धर्मस्थापना का गहन उद्देश्य निहित होता है। भगवान कार्तिकेय जी का दक्षिण दिशा में निवास भी ऐसी ही एक दिव्य लीला है।
दक्षिण दिशा की ओर क्यों गए कार्तिकेय जी?


ब्रह्मचारी श्री निर्विकल्प स्वरूप जी महाराज ने कहा कि भगवान कार्तिकेय जी के दक्षिण दिशा में निवास को केवल माता-पिता से रुष्ट होने की घटना के रूप में देखना उचित नहीं है। भगवान जो कुछ भी करते हैं, वह लीला मात्र होती है। उनके प्रत्येक कार्य में सृष्टि के कल्याण का कोई न कोई गूढ़ प्रयोजन छिपा रहता है।
उन्होंने बताया कि प्राचीन काल में नर्मदा जी के दक्षिण का क्षेत्र ऐसा था, जहां सामान्यतः ऋषि-मुनि, देवगण एवं संतजन कम ही जाते थे। उस समय अधिकतर धार्मिक एवं आध्यात्मिक गतिविधियों का केंद्र उत्तर भारत की ओर ही माना जाता था। ऐसे में भगवान कार्तिकेय जी ने दक्षिण दिशा को अपनी लीला-भूमि बनाने का संकल्प किया, ताकि वहां निवास करने वाले जनसमुदाय को भी भगवान की भक्ति, उपासना और धर्ममार्ग का सहज अवसर प्राप्त हो सके।
‘जहां कोई नहीं जाता, वहां भगवान स्वयं पहुंचते हैं’


कथा व्यास ने कहा कि भगवान की करुणा किसी एक स्थान अथवा वर्ग तक सीमित नहीं है। जहां मनुष्य की पहुंच नहीं होती, वहां भी भगवान अपनी कृपा लेकर पहुंच जाते हैं। भगवान कार्तिकेय जी ने दक्षिण दिशा में निवास करके उस भू-भाग को अपनी भक्ति और आराधना की पवित्र भूमि बना दिया। यह केवल एक धार्मिक प्रसंग नहीं, बल्कि भगवान के सार्वभौमिक लोकमंगल का संदेश है।
उन्होंने कहा कि भगवान ने ऐसी लीला की, जिससे दक्षिण भारत के निवासियों को भी अपने आराध्य की सहज प्राप्ति हो सके। यही कारण है कि आज भी दक्षिण भारत में भगवान कार्तिकेय जी की आराधना अत्यंत श्रद्धा और भक्ति के साथ की जाती है।


दक्षिण भारत में ‘मुरुगन स्वामी’ के रूप में पूजे जाते हैं कार्तिकेय
ब्रह्मचारी जी ने बताया कि भगवान कार्तिकेय जी दक्षिण भारत में विशेष रूप से लोकप्रिय एवं पूजनीय हैं। वहां उन्हें श्रद्धापूर्वक ‘मुरुगन स्वामी’ के नाम से जाना जाता है। दक्षिण भारत के अनेक क्षेत्रों में भगवान मुरुगन की भव्य उपासना परंपरा आज भी जीवंत है। करोड़ों श्रद्धालु उन्हें शक्ति, साहस, ज्ञान और विजय के देवता के रूप में आराध्य मानते हैं। उन्होंने कहा कि भगवान कार्तिकेय जी का दक्षिण में निवास इस बात का प्रमाण है कि सनातन परंपरा में भगवान की कृपा किसी सीमा में बंधी हुई नहीं है। भगवान स्वयं वहां पहुंचते हैं, जहां उनके भक्तों को उनकी सबसे अधिक आवश्यकता होती है।


भगवान की लीलाएं देती हैं लोककल्याण का संदेश
कथा व्यास ने कहा कि भगवान की लीलाओं को केवल सांसारिक घटनाओं के रूप में देखने के बजाय उनके आध्यात्मिक और लोककल्याणकारी पक्ष को समझना चाहिए। भगवान कभी किसी भक्त को अपने से दूर नहीं करते। उनकी प्रत्येक लीला के भीतर किसी न किसी रूप में धर्म, भक्ति, ज्ञान और लोकमंगल का संदेश छिपा होता है।
उन्होंने कहा कि भगवान कार्तिकेय जी का दक्षिण में निवास भी इसी दिव्य भावना का प्रतीक है। उन्होंने अपने भक्तों के कल्याण और उस क्षेत्र में धर्म की ज्योति प्रज्वलित करने के लिए दक्षिण दिशा को अपनी कर्मभूमि बनाया।
कथा स्थल पर उमड़ा श्रद्धालुओं का सैलाब
षष्ठ दिवस की कथा में भगवान कार्तिकेय जी के प्रसंग ने श्रद्धालुओं को भावविभोर कर दिया। कथा के दौरान स्मृति लॉन का वातावरण ‘हर हर महादेव’ और भगवान कार्तिकेय जी के जयघोष से गूंज उठा। बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने कथा का श्रवण कर आध्यात्मिक संदेश को आत्मसात किया। महाराज जी ने श्रद्धालुओं से भगवान की कथाओं को केवल सुनने तक सीमित न रखते हुए उनके जीवनोपयोगी संदेशों को आचरण में उतारने का आह्वान किया।