पर्यावरण प्रेमी और वर्तमान व्यववस्था के खिलाफ अपने आप को सोशलमीडिया पर अपने आपको क्रांतिकारी का ढोंग पीटने वाले जितेन्द्र उर्फ राजा लिल्हारे को उच्च न्यायालय से लगा तगडा झटका। न्यायालय ने ना केवल उनके द्वारा लगाई गई जनहित याचिका को खारीज किया बल्कि अदालती कार्रवाई के साथ खिलवाड एवं तथ्यो को छिपाने का दोषी पाते हुए उनपर एक लाख रूपये का भारी भरकम जुर्माना ठोकते हुए माननीय न्यायालय ने उनपर सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि याचिकाकर्ता कोई भोला भाला ग्रामीण नही बल्कि कानून के दांवपेंच से खेलने वाला शातिर व्यक्ति जान पडता है अदालत का यह फैसला उन सभी लोगो के लिए एक बडी चेतावनी है जो जनहित के कार्य करने का मुखौटा पहनकर सोशलमीडिया पर अपनी छवि चमाकते हुए अपनी निजी रंजिश निकालने के लिए न्यायालय की शरण लेते है। उक्त मामला यह साबित करता है कि सत्य को छिपाकर न्याया नही पाया जा सकता। बालाघाट में चर्चाओ का दौर का गर्म है कि अपने आप को क्रंातिकारी बताने वाले राजा लिल्हारे अब स्वयं कानूनी चक्रव्यूह में फंसकर ढेर हो गए है।
सिवनी – बालाघाट के भोरगढ के रहने वाले राजा लिल्हारे बहुत लम्बे समय से फेसबुक और और अन्य सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर बालाघाट कलेक्टर एसपी खनिज अधिकारी एवं रेत ठेकेदार राजेश पाठक के विरूद्ध फर्जी तरीके से अपनी आवाज बुलंद कर यह साबित करने की कोशिश की जा रही थी कि राजेश पाठक अधिकारियो से सांठगांठ कर अवैध रूप से खनिज संपदा रेत का उत्खनन कर शासन एवं प्रकृति के साथ छेडछाड की जा रही है। और स्वयं को एक साधारण ग्रामीण और प्रकृति प्रेमी बताते हुए लोगो की सहानभूति अर्जित करने का प्रयास कर रहे थे इसी तारतम्य में उसने उच्च न्यायालय में जनहित याचिका संख्या 2714/26 दायर की थी जिसमें उन्होने मांग की थी कि प्रशासन रेत माफिया के खिलाफ उचित कार्रवाई करे और उनकी शिकायतो पर कलेक्टर एक तय समय सीमा पर निर्णय लेने का निर्देश जारी करें। उसने कोर्ट को यह विश्वास दिलाने की कोशिश की कि क्षेत्र में चल रहे अवैध उत्खनन से परेशान होकर न्याय की गुहार लगा रहा है।
राजा लिल्हारे के झूठ की खुली पोल
मामले की सुनवाई के दौरान शासन का पक्ष रखते हुए उपमहाधिवक्ता अभीजीत अवस्थी ने राजा लिल्हारे के झूठ की पोल खोल दी। और उन्होने न्यायालय को अवगत कराया कि याचिकाकर्ता ने इससे पहले भी इस संदर्भ में एक याचिका डब्लूपी 36057/2024 दायर की थी उस समय उसने राष्ट्रीय हरित अधिकारण ( एनजीटी ) जाने का हवाला देकर याचिका वापस ली थी लेकिन अपनी नई याचिका में राजा लिल्हारे द्वारा इस पुराने मुकदमे का किसी प्रकार से कोई उल्लेख नही किया गया। जो कि सत्य को छिपाना माना जाता है जब कोई ने इस संदर्भ में स्पष्टीकरण मांगा तो राजा लिल्हारे के वकील ने तुरंत याचिका में संशोधन का आवेदन देकर अपनी गलती सुधारने का प्रयास किया। जिसे कोर्ट ने उनकी चालाकी माना।
मासूम ग्रामीण का बहाना हुआ खारीज
राजा लिल्हारे से जुर्माने से बचने के लिए न्यायालय में बिना शर्त माफी मांगते हुए अपनी पक्ष रखा कि वह एक साधारण किसान है और उसे कानून की तकनीकी बारीकियो का ज्ञान नही है। जिसे माननीय न्यायमूर्ति विवेक रूसिया एवं न्यायमूति प्रदीप मित्तल की खंडपीठ ने सिरे से नकार दिया। और न्यायालय ने कहा कि यह नही कहा जा सकता कि याचिकाकर्ता एक निर्दोष व्यक्ति या सामान्य ग्रामीण है। वह दो बार एनजीटी दो बार हाईकोर्ट तथा यहा तक कि प्रधानमंत्री कार्यालय तक अपनी शिकायते दर्ज करा चुका है। ऐसे व्यक्तियो को कानून की समझ ना होना असंभव है।
निजी स्वार्थ और रंजिश की दुर्गंध
कोर्ट ने संदेह व्यक्त किया कि इस याचिका के पीछे निजी स्वार्थ या राजेश पाठक के साथ कोई पुरानी रंजिश अधिक और पर्यावरण प्रेम कम जा पडता है। अदालत ने माना कि याचिकाकर्ता ने जानबूझकर तथ्य छिपाकर कोर्ट का उपयोग अपने निजी हितो को साधने लिए कर सके इसी कारण संशोधन आवेदन को अवास्तविक करते हुए नमाजुंर कर दिया।
जुर्माना जमा करने मिले चार हफते
उच्च न्याायालय ने राजा लिल्हारे पर लगाए एक लाख रूपये के जुर्माने को चार सप्ताह के अंदर सीसीडी के खाते मे जमा करने का आदेश दिया यदि निर्धारित समय में तय राशि जमा नही की जाती है तो भूराजस्व संहिता के तहत आ राशि के माध्यम से उसकी वसूली की जाएगी। साथ ही कोर्ट ने चेतावनी दी की यदि भविष्य में दोबारा ऐसा आचरण किया तो उसके विरूद्ध अवमानना की कार्रवाई शुरू की जाएगी।







